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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

स्वतो यदात्मदृषदश्चित्त्वात्काठिन्यवेदनम् । तदहंतादि भेदादि देशकालादितां गतम् ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मरूप पाषाण का चित्‌ होने से जो स्वतः काठिन्य प्रथितिरूप वेदन है वह अहन्ता, त्वन्ता आदिरूप, घट, दीवार भेद आदिरूप और देश, कालादि रूपता को प्राप्त हुआ है