Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
स्वतो यदात्मशैलस्य ज्ञतया जाड्यवेदनम् ।
तदहंतादि भेदादि भुवनादीति संस्थितम् ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मरूप पर्वत का चेतन होने से जो स्वतः गुरुता प्रथितिरूप वेदन है वह
अहन्ता, त्वन्ता आदिरूप, घट, दीवार भेदादिरूप भुवनरूप से स्थित है