Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
यदात्मगगनस्यान्तश्चित्त्वाच्छून्यत्ववेदनम् ।
तदहंतादि भेदादि भुवनादीति भावनम् ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मरूपी आकाश का चित् होने से जो शून्यता प्रथितिरूप वेदन है वह अहन्ता,
त्वन्ता आदिरूप, घट, दीवार भेद आदिरूप भुवन आदि है, ऐसी कल्पना है