Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 57, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 57, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 57 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
स्वतो यदात्मवृक्षस्य शाखादिस्तस्य वेदनम् ।
तदहंतादि भेदादि भुवनादीव सत्स्फुरत् ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्मरूप वृक्ष चित् होने से जो शाखादिरूप से प्रथितिरूप
वेदन है वह अहन्ता, त्वन्ता आदिरूप, घट, दीवार भेद आदिरूप भुवन आदि के समान वर्तमान और
भासमान है