Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 20
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 20 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 20
संस्कृत श्लोक
इति दोलायितं चेतो न विशश्राम भूपतेः ।
एकत्राम्बुमहावर्ते चिरतृष्णमिव भ्रमत् ॥ २० ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे सोये हुए प्यासे पुरुष का बहुत काल की तृष्णा से
युक्त मन जल के बड़े बड़े आवर्तों में घूमकर कहीं एक जगह विश्राम नहीं पाता, वैसे ही भूमि पति सुरघु
का उपर्युक्त विकल्पों से चंचल हुआ मन कहीं एक जगह विश्राम को प्राप्त नहीं हुआ