Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 29
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 29 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 29
संस्कृत श्लोक
माण्डव्य उवाच ।
स्वयत्नेन स्वसंस्थेन स्वेनोपायेन भूपते ।
एषा मनःपेलवता हिमवत्प्रविलीयते ॥ २९ ॥
हिन्दी अर्थ
माण्डव्य ने कहा : राजन, जैसे (धूप से) कुहरा नष्ट हो जाता है,
वैसे ही वैराग्य, त्याग आदि स्वयत्न से तथा आत्मसाक्षात्कार होने तक निरन्तर अनुष्ठित श्रवण, मनन
आदि आत्मा के अभिव्यंजक उपायों से यह मन की मृदुता यानी हर्ष, विषाद आदि कण्टको से होनेवाली
छेदन योग्यता विनष्ट हो जाती है