Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verses 35–38
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verses 35–38 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
तिष्ठदेव मनोरूपं परित्यक्ष्यति तेऽनघ ।
कलङ्कविकलं कालं मन्वन्तरगताविव ॥ ३५ ॥
अनुकम्प्या भविष्यन्ति श्रीमन्तः सर्व एव ते ।
दृष्टतत्त्वस्य तुष्टस्य जनाः पितुरिवावनौ ॥ ३६ ॥
विवेकदीपदृष्टात्मा मेर्वब्धिनभसामपि ।
अधो करिष्यसि नृप महत्तामुत्तमार्थदाम् ॥ ३७ ॥
महत्तामागते चेतस्तव संसारवृत्तिषु ।
न निमज्जति हे साधो गोष्पदेष्विव वारणः ॥ ३८ ॥
हिन्दी अर्थ
तब क्या मन की सत्ता ही विनष्ट हो जायेगी ? नहीं, ऐसा कहते है।
जैसे पहले मनु के बाद कलिकाल को प्राप्तकर अनेकविध पापों से आक्रान्त हुआ भूमण्डल फिर
दूसरे मनु की गति में विद्यमान रहता हुआ ही पापों से छुटकारा पाता हे, वैसे ही जीवन्मुक्त के व्यवहार
में समर्थ होने से मन भी विद्यमान रहता हुआ ही पहले के अपने रूप को छोड़ देता है