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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 39

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 39 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 39

संस्कृत श्लोक

कृपणं तु मनो राजन्पेलवेऽपि निमज्जति । कार्ये गोष्पदतोयेऽपि जीर्णाङ्गो मशको यथा ॥ ३९ ॥

हिन्दी अर्थ

केवल दुःखनिवृत्ति ही तत्त्वज्ञान का फल नहीं है, किन्तु जिस साम्राज्य में ब्रह्मा आदि देवताओं के ऊपर भी अनुकंपा की जाती है, वैसा निरतिशयानन्द साम्राज्य भी फल है, ऐसा कहते है । जैसे लोक में प्रजाजन पालन करनेवाले सन्तुष्ट पिता की कृपा के पात्र होते हे, वैसे ही वे विभव सम्पन्न ब्रह्मा आदि बड़े देवता भी विदित तत्त्व अतएव सन्तुष्ट आपकी कृपा के पात्र होगे ॥ ३ ६॥ जब आकाश आदि की भी महत्ता उसकी सत्ता के अधीन है, तब उसकी सवतिशायिनी (सभीसे बढ़ी चढ़ी) महत्ता मे तो कहना ही क्या ? इस आशय से कहते है। हे राजन्‌, विवेक जनित ज्ञानरूप दीप से आत्मतत्त्व को जान लेने पर आप मेरू, समुद्र ओर आकाश को भी उत्तम अर्थ देनेवाली महत्ता पायेंगे ॥ ३ ७॥ हे साधो, जैसे गाय के खुरमात्र जल में हाथी नहीं डूबता, वैसे ही महत्त्व प्राप्त कर लेने पर आपका अन्तःकरण संसारिक वृत्तियों में नहीं डूबेगा ॥ ३ ८॥ राजन्‌, जैसे शिथिल शरीरवाला मच्छर गाय के खुरमात्र जल में डूब जाता है, वैसे ही काम, कार्पण्यआदि दोषों से दूषित मन तुच्छ कार्य में भी मोह को प्राप्त हो जाता हे