Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 58, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 58, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 58 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
यावत्सर्वं न संत्यक्तं तावदात्मा न लभ्यते ।
सर्वावस्थापरित्यागे शेष आत्मेति कथ्यते ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
कहे गये ही अर्थ को व्यतिरेक से भी दढ करते हैं।
जब तक सम्पूर्ण दृश्यों का परित्याग नहीं होता, तब तक आत्मा का लाभ नहीं होता यानी साक्षात्कार
नहीं होता, क्योकि सभी अवस्थाओं का परित्याग करने पर जो शेष रहता हे, वही आत्मा कहा जाता
है