Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 59, Verses 31–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 59, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 59 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
अहो त्वहं प्रबुद्धोऽस्मि गतं दुर्दर्शनं मम ।
दृष्टं द्रष्टव्यमखिलं प्राप्तं प्राप्यमिदं मया ॥ ३१ ॥
सर्वं किंचिदिदं दृश्यं दृश्यते यज्जगद्गतम् ।
चिन्निष्पन्दांशमात्रांशान्नान्यत्किंचन शाश्वतम् ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
अहो, अब तो मैं
जाग गया हूँ, मेरा असद्विचार नष्ट हो गया, जो दृष्टव्य था, उसे समग्ररूप से मैंने देख लिया और यह जो
प्राप्तव्य था, उसे प्राप्त कर लिया