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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 6, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 6, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 6 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

केचित्स्ववासनातन्तुबद्धाः कर्मफलोदिताः । तिर्यक्त्वात्स्थावरतनुं यान्ति तिर्यक्तनुं ततः ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

नरको में उपभुक्त दुष्कर्म फलों के क्रम से तिर्यक्‌ योनि में उत्पन्न हुए, अपने वासनारूप तन्तु ओं से बधे हुए कोई जीव तिर्यग्‌ योनि से वृक्ष आदि स्थावर योनि को प्राप्त होते हैं, उनसे फिर तिर्यग्‌ योनि को जाते हैं