Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 61, Verse 2
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 61, verse 2 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 61 · श्लोक 2
संस्कृत श्लोक
एतां दृष्टिमवष्टभ्य न मनः परितप्यते ।
घोरे तमसि निर्मग्नं लब्धदीपं शिशुर्यथा ॥ २ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे घोर अन्धकार
मे बैठा हुआ बालक प्रकाश को प्राप्त कर खिन्न नहीं होता, वैसे ही गाढ़ अज्ञानरूपी अन्धकार में डूबा
हुआ मन इस बोधात्मक दृष्टि का अवलम्बन लेकर प्रकाश को प्राप्त कर सन्तप्त नहीं होता