Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 62, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
अजस्रमम्बुवहनाद्यथा नद्या न रुद्ध्यते ।
तथा विज्ञानदृग्बोधात्क्षणमात्रं न रुद्ध्यते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
आत्सस्वरूप को आवृत करनेवाले अज्ञान का एक बार उदित हुई ब्रह्माकार वृत्ति से समूल नाश हो
जाता है तो फिर वह आवरण करने की शक्ति ही नहीं रखता, इसलिए तत्त्ववेत्ता को स्वरूपावरणरूप
समाधि भंग का प्रसंग ही नहीं है इस आशय से कहते है ।
जैसे नदी निरन्तर जल के प्रवाह से क्षणमात्र भी रुक नहीं सकती, वैसे तत्ववित् की
आत्मतत्त्वसाक्षात्कारात्मक दृष्टि स्वरूपज्ञान से क्षणमात्र भी रुक नहीं सकती यानी तत्त्वज्ञ का
साक्षात्कारात्मक बोध किसी आवरण से आवृत नहीं होता