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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 14

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 62, verse 14 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 14

संस्कृत श्लोक

समग्रं दिनमालोकाद्विरमत्यक्षयो यथा । आजीवितान्तं नो प्रज्ञा तथा तत्त्वावलोकनात् ॥ १४ ॥

हिन्दी अर्थ

यदि शंका हो कि तत्त्ववेत्ता को भी ब्रह्माकाखृत्ति का विच्छेद होने पर व्युत्थानावस्था में समाधि का भंग हो जायेगा, तो इस पर कहते हैं। जैसे सूर्य सारे दिन प्रकाश से विराम नहीं करता, अपितु प्रकाशपूर्ण ही रहता है, वैसे ही तत्त्वज्ञानी की प्रज्ञा जीवनपर्यन्त यानी विदेह मुक्ति पर्यन्त तत्त्व के अवलोक से विराम नहीं करती, अपितु दृढ़ संस्कार के कारण सदा सर्वदा अनुवर्तन करती ही रहती है