Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 23
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 62, verse 23 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 23
संस्कृत श्लोक
तस्मात्कदाचिदपि मे नासमाधिमयं मनः ।
न वा समाहितं नित्यमात्मतत्त्वैकसंभवात् ॥ २३ ॥
हिन्दी अर्थ
यदि आप यह मानते हैं कि मन है, तो वह सदा सर्वदा समाहित ही है और यदि यह मानते हैं कि मन
नहीं है, तो समाधि भी है ही नहीं क्योकि विक्षेप का हेतु ही नहीं रहा, इस आशय से सुरघु उपसंहार
करते हैं।
इसलिए यदि मेरा मन है तो वह किसी भी समय समाधि से वर्जित नहीं और यदि नहीं है, तो मन
किसी भी समय समाधि से युक्त नहीं है, अर्थात् समाधि करने की आवश्यकता ही नहीं रहती, क्योंकि
विक्षेपकारण के न रहने से अद्वितीय आत्मतत्त्व की एकरूपता का ही सदा सर्वदा संभव है