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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 62, Verse 4

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 62, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 62 · श्लोक 4

संस्कृत श्लोक

सुरघुरुवाच । एतन्मे ब्रूहि भगवन्सर्वसंकल्पवर्जितम् । परमोपशमं श्रेयः समाधिर्हि किमुच्यते ॥ ४ ॥

हिन्दी अर्थ

जबकि आपका यह अनुभव है। समाहित चित्तवाले पुरुष के सभी कर्म सुख के लिए हैं और आपके इस अनुभव के साथ मेरा भी अनुभव संवाद रखता ही है, तब समाधि में अधिक विश्रान्ति का प्रदर्शन तथा व्यवहार ओर समाधि का भेद मानकर किया गया प्रश्न दोनों आपके अयुक्त ही हैं, इस आशय से तत्त्वज्ञ राजा सुरघु : “संकल्परहित विक्षेपात्मक दुःखो का परम उपशम और सांसारिक सुखों की अपेक्षा अधिक श्रेष्ठ, इस अंश का आत्मरूपता में भी संभव होने के कारण तन्मात्र का स्वीकार करते हुए विश्रान्ति स्थान समाधि का अनुष्ठान करते हैं 2“ यह प्रश्नांश असंभव है क्योकि अविश्राम के हेतु मन का तो बाघ हो ही चूका है यों मानकर आक्षेप करते हैं। सुरघु ने कहा : भगवान, युक्त होने के कारण आप मुझसे यही कहिये कि सम्पूर्ण संकल्पोंसे रहित निरतिशय उपशमरूप (आत्मा) सांसारिक सुखों की अपेक्षा प्रशस्त है, परन्तु यह आप मुझसे क्यों कहते हैं कि समाधि का अनुष्ठान करना चाहये