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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verses 32–34

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 32

संस्कृत श्लोक

यस्मिन्देशमरौ तज्ज्ञो नास्ति सज्जनपादपः । सफलः शीतलच्छायो न तत्र निवसेद्बुधः ॥ ३२ ॥ स्निग्धशीतवचःपत्रे सच्छाये स्मितपुष्पके । क्षणाद्विश्रम्यते राम भृशं सुजनचम्पके ॥ ३३ ॥ तदभावे महामोहतापसंपत्तिदायिनि । किंचिज्जातविवेकेन स्वप्तव्यं नेह धीमता ॥ ३४ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, मरुभूमि की नाईं जिस भूमि में मोक्षरूपी फल को देनेवाला और मानसिक शान्तिरूपी शीतलछाया को करनेवाला तत्त्वज्ञ सत्‌-पुरुषरूपी वृक्ष विद्यमान न हो, वहाँ विद्वानों को नहीं रहना चाहिए