Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
आत्मैव ह्यात्मनो बन्धुरात्मनात्मैवमुद्धरेत् ।
नात्मानमवलेपेन जन्मपङ्कार्णवे क्षिपेत् ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीरामचन्द्रजी, मनोहर और तापोपशामक शीतलवचन ही जिसके पत्ते हैं,
परोपकार परायणता ही जिसकी उत्तम छाया है और मुसकुराहट ही जिसके पुष्प हैं, ऐसे सत्पुरुषरूपी
चम्पा के वृक्ष के नीचे मनुष्य को क्षणभर में ही आत्यन्तिक विश्रान्ति (आत्मलाभरूप विश्रान्ति) प्राप्त
हो जाती है ॥३ ३॥ जिसको तनिक भी विवेक हुआ हो, ऐसे बुद्धिमान् पुरुष को इस संसार में स्वल्प भी
निद्रा नहीं लेनी चाहिए, जहाँ कि स्वात्मप्राप्ति रूप विश्रान्ति का अभाव है ओर जो महामोह से जनित
संताप रूपी संपत्ति को देनेवाला है ॥३ ४॥ आत्मा ही आत्मा का मित्र है, इसलिए इन साधुसमागम आदि
उपायों से अपने आप ही अपना उद्धार कर लेना चाहिए, न कि देहाभिमान के गर्व से जन्म कीचड़ के
समुद्र में अपने को फसा देना चाहिए