Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 50
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verse 50 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 50
संस्कृत श्लोक
अदूरगतसादृश्यात्सुषुप्तस्योपलक्ष्यते ।
सावस्था भरिताकारा गगनश्रीरिवातता ॥ ५० ॥
हिन्दी अर्थ
किस तरीके से तु्यावस्था की संभावना होगी ? तो इस पर कहते हैं।
तुर्यावस्था में स्थित निर्विक्षेपत्व अंश को लेकर सुषुप्ति के पास पहुँचा हुआ जो सादृश्य है, उस
सादृश्य से सुषुप्ति अवस्था के समीप तुर्यावस्था संभावित होती है यानी यदि सुषुप्ति अवस्था में
अज्ञानरूपी आवरण न होता, तो वह तुर्यावस्था ही होती, इस रीति से सुषुप्त अवस्था से उसकी
संभावना की जा सकती है। वह निर्विकल्प परमात्मभावावस्था सम्पूर्ण आकारों से परिपूर्ण तथा आकाश-
कोश की नाई सर्वत्र व्याप्त हे