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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verses 51–52

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verses 51–52 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 51,52

संस्कृत श्लोक

मनोहंकारविलये सर्वभावान्तरस्थिता । समुदेति परानन्दा या तनुः पारमेश्वरी ॥ ५१ ॥ सा स्वयं योगसंसिद्धा सुषुप्तादूरभाविनी । न गम्या वचसां राम हृद्येवेहानुभूयते ॥ ५२ ॥

हिन्दी अर्थ

घट का विनाश होने पर जैसे घटाकाश महाकाशस्वरूप हो जाता है, वैसे ही मन, अहंकार आदि उपाधियों का विनाश होने से त्वं पद से लक्षित होनेवाले आत्मा के स्वरूपभूत हो जाता है, ऐसा कहते हैं । मन ओर अहंकार का विलय होने पर समस्त पदार्थो के भीतर रहनेवाली जिस निरतिशयानन्दात्मक परमात्मस्वरूपावस्था का आविर्भाव होता हे, उस अवस्था का, जो स्वयं समाधि से सिद्ध, तथा सुषुप्त अवस्था के साथ पूर्वोक्तरूप से किसी अंश में मिलती जुलती है, वाणी से परिज्ञान नहीं होता, केवल अपने इस हृदय मेँ ही उसका अनुभव होता हे, अपने अनुभव के सिवा उसका दूसरा परिचायक नहीं है, यह भाव हे