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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 64, Verse 7

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 64, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 64 · श्लोक 7

संस्कृत श्लोक

व्यवहारपरोऽत्युच्चै रागद्वेषमयोऽपि सन् । नान्तःकलङ्कमायाति पद्मो जलगतो यथा ॥ ७ ॥

हिन्दी अर्थ

रामजी, जैसे जल में रहनेवाला कमल कीचड़ आदि कलंकों से कलंकित नहीं होता, वैसे ही तत्त्वज्ञ व्यवहार मे निरत अतएव अज्ञानी जनों द्वारा “यह राग और द्वेष से भरा है” यों कल्पित हो रहे भी राग, द्वेष आदि भीतरी कलंकों से कलंकित नहीं होता