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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, Verses 11–13

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 65, verses 11–13 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 11-13

संस्कृत श्लोक

विद्याधराश्रितगुहो भृङ्गगीताम्बुजाकरः । किरातगीतपर्यन्तः खगगीतवनद्रुमः ॥ ११ ॥ स्कन्धेषु देवैर्वलितः पादेषु वलितो नरैः । पाताले वलितो नागैर्जगद्गृहमिवापरम् ॥ १२ ॥ कन्दरेषु श्रितः सिद्धैर्निधानैरन्तराश्रितः । चन्दनेषु श्रितो नागैः सिंहैः श्रृङ्गशिखासु च ॥ १३ ॥

हिन्दी अर्थ

उस पर्वत की गुहाएँ विद्याधरों से आश्रित हैं, जिनमें भँवरों के मधुर गीत हो रहे हैं, ऐसे कमलों का वह आगर है, उसके नीचे देश में किरात अपना निराला गीत गा रहे हैं, वनों के वृक्षों में पक्षियों का मधुर कलनाद हो रहा है । सारे संसार का मानों यह दूसरा घर है, क्योकि उस पर्वत का ऊपरी हिस्सा देवों से भरा है, नीचे का हिस्सा मनुष्यों से भरा है और पृथ्वी के भीतर का हिस्सा नागों से भरा हे । उसकी छोटी छोटी कन्दराओं में सिद्ध लोग रहते हैं, भीतरी भागों में अनेक निधियाँ गड़ी हैं । चन्दन-वृक्षों में सर्प रहते हैं और शिखरों की चोटियों पर सिंह रहते हैं