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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, Verses 5–10

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 65, verses 5–10 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 5-10

संस्कृत श्लोक

अस्त्युत्सेधजिताकाशः पीठेन जितभूतलः । तलेन जितपातालस्त्रिलोकविजयो गिरिः ॥ ५ ॥ असंख्यकुसुमापूरोऽसंख्यनिर्मलनिर्झरः । गुह्यकारक्षितनिधिः सह्यनामाऽविषह्यभाः ॥ ६ ॥ मुक्तापटलसंपूर्णैर्भानुभासुरभित्तिभिः । भासुरः काञ्चनतटैः कटैरिव सुरद्विपः ॥ ७ ॥ क्वचित्पुष्पभरासारो धातुसाराततः क्वचित् । क्वचित्फुल्लसरःसारो रत्नशालिशिलः क्वचित् ॥ ८ ॥ इतो रटन्निर्झरवानितः क्वणितकीचकः । इतो रटद्गुहावात इतः षट्पदघुंघुमः ॥ ९ ॥ सानौ गीतोऽप्सरोवृन्दैर्वने मृगखगारवः । अधित्यकायां मत्ताभ्रो गगनेषु खगारवः ॥ १० ॥

हिन्दी अर्थ

से युक्त सुवर्णमय नितम्ब देश से वह गण्डस्थल से एरावत की नाई बड़ा भला लगता है । उस पर्वत पर कहीं अनेक तरह के पुष्पों के समूह के समूह मिलकर प्रवाहित हो रहे है, करीं हरिताल, गौरिक आदि धातुएँ भरी पड़ी हैं, कहीं विकसित कमलों से सुशोभित सरोवर हैं, कहीं रत्नों से युक्त शिलाएँ है । उस पर्वत पर किसी स्थान में झरनों की गुनगुनाहट हो रही है, कहीं वायु प्रवेश से बाँसों के मधुरशब्द हो रहे हैं, कहीं गुहाओं से निकला वायु सनसनाहट कर रहा है, कहीं भ्रमरों का मंजुल घुंघुम शब्द हो रहा है। उसके शिखर पर अप्सराएँ कहीं गान गा रही हैं, उसके वनप्रदेश में मृग और पक्षियों के सुन्दर शब्द हो रहे हैं। उसके ऊपरी प्रदेश में मत्तों की नाईं मेघ गर्ज रहे हैं और आकाश प्रदेश में पक्षियों के शब्द हो रहे हैं