Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 65, Verse 25
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 65, verse 25 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 65 · श्लोक 25
संस्कृत श्लोक
नाऽयुक्तौ पुत्रयुक्तौ तु सुरक्ताविव दंपती ।
एकं द्वित्वमिवापन्नं सममासीत्तयोर्मनः ॥ २५ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे पुत्र के लिए मिले हुए अनुरक्त पति-पत्नी
एक दूसरे से अलग नहीं होते, वैसे ही वे दोनों कभी भी एक दूसरे से अलग नहीं होते थे, उन दोनों के मन
समान होने के कारण ऐसा मालूम पड़ता था कि एक ही मन ने मानों दो भागों में बँट कर दो स्वरूप धारण
कर लिये है