Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verses 11–12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 66, verses 11–12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 11,12
संस्कृत श्लोक
आशा यावदशेषेण न लूनाश्चित्तसंभवाः ।
वीरुधो दात्रकेणेव तावन्नः कुशलं कुतः ॥ ११ ॥
यावन्नाधिगतं ज्ञानं यावन्न समतोदिता ।
यावन्नाभ्युदितो बोधस्तावन्नः कुशलं कुतः ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे लताओं के बन्धन सरोते आदि से काटे जाते हैं, वैसे ही जब
तक चित्त में उत्पन्न हुई आशाएँ पूर्णरूप से काटी नहीं जाती, तब तक हमें कुशलता कहाँ ? जब तक
आत्मज्ञान (शोधित “त्वम्' ओर "तत्" पदार्थ का परिज्ञान) प्राप्त नहीं हो जाता, जब तक समभाव का
उदय नहीं होता और जब तक अखण्ड वाक्यार्थ-बोध नहीं हो जाता, तब तक हम लोगों की कुशलता
कहाँ ?