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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 16

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 66, verse 16 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 16

संस्कृत श्लोक

भुक्तकर्मर्तुविरसा पुराणदिवसोम्भिता । नीयते नीरसप्राया पुनः संवत्सरावली ॥ १६ ॥

हिन्दी अर्थ

जिनमें कर्मों का उपभोग किया जा चुका है, ऐसी वसन्त आदि ऋतुओं से सारहीन, प्राचीन दिवसों से पूरित अतएव प्रायः नीरस यह संवत्सरों की परम्परा पुनः व्यर्थ ही बिताई जाती है। भाव यह है कि यदि प्राणी का दुष्ट प्रारब्ध हुआ तो उसको मरण के बाद नरक, स्थावर भाव या पशु आदि निकृष्ट योनियो में जन्म प्राप्त हो जाता है और यदि अच्छा प्रारब्ध हुआ तो स्वर्ग प्राप्त होता है। मरण के अनन्तर यदि नरक आदि मिले, तो वहाँ पर वसन्त आदि ऋतुओं में जिनमें कि ठंडी, गर्मी, वायु, वर्षा, सर्प, मच्छर आदि दुःखदायी असंख्य प्रतिबन्धक भरे पड़े हैं दुष्कृत कर्मो का उपभोग करना ही पड़ता हे, अतएव इस ऋतुओं में सरसता कहाँ रही, इन्हीं के कारण वसन्त आदि छः ऋतुओं के मिलने पर हुआ वर्ष भी विरस ही होगा ओर सुतरां वर्ष परम्परा भी, इस अभिप्राय से “भुक्तकर्म्तुविरसा" यह “संवत्सरावली” का विशेषण है। अच्छे प्रारब्ध से मरण के बाद यदि स्वर्ग मिला, तो वहाँ पर गया हुआ प्राणी दूसरे पुण्य का साधन कर नहीं सकता, क्योकि स्वर्ग में केवल भोग ही भोग होता हे, पुण्य का संचय नहीं होता, जो पहले का संचित पुण्य होगा, उसका तो व्यय ही होगा । दूसरी बात यह है कि स्वर्ग में अपने अपने पुण्यो के अनुसार ऊँचे नीचे फलों का उपभोग कर रहे दूसरे जीवों को देखकर प्राणी को हर्ष, असूया आदि होते है, ऐसी स्थिति में हर्ष, अमर्ष, असूया, काम आदि दोषों की अधिकता से शम, दम आदि का अनुष्ठान न हो सकने के कारण आत्मज्ञान की प्राप्ति भी स्वर्ग में दुर्लभ है । अतः विषयानुरक्ति से जिन-जिन विषयों का वहाँ पर बैठकर प्रतिदिन उपभोग किया जाता है, उन सबका पहले अनेक बार उपभोग किया जा चुका है, नवीन विषय तो कोई है नहीं, अत: प्राचीन अनुभूत विषयोपभोग से दिन भी प्राचीनप्राय हुए। वर्षात्मक काल दिवसों से पूर्ण है, अतः “एवंविध प्राचीन दिनों से पूरित" एतदर्थक *पुराणदिवसोम्भिता” यह दूसरा विशेषण “संवत्सरावली' का है