Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 26
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 66, verse 26 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 26
संस्कृत श्लोक
भोगभोगिश्रितेष्वन्तर्दुःखदर्दुरधारिषु ।
मनोमोहान्धकूपेषु पूरेषु विनिमज्जति ॥ २६ ॥
हिन्दी अर्थ
जिनमें भोग ही बड़े-बड़े
सर्प रहते हैं और जिन्होंने आन्तर दुःखात्मक मेढकों को धारण किया हे, ऐसे मोहों के अन्धकूपों में
अवस्थित जल-प्रवाहो मेँ मन डूबता रहता है