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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verse 27

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 66, verse 27 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 27

संस्कृत श्लोक

नानानुरञ्जनास्पृष्टा तृष्णा तरलपेलवा । चैत्यमग्रपताकेव दूरं समधिरोहति ॥ २७ ॥

हिन्दी अर्थ

अनेक तरह के अनुरागो में लगी हुई यह तरल तुच्छ तृष्णा, देवमन्दिरों के ऊपर लगी पताका की नाई, ऊँची ही चढ़ी रहती है