Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 66, Verses 32–34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 66, verses 32–34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 66 · श्लोक 32
संस्कृत श्लोक
देहरत्नशलाकेयं नाशपङ्कार्णवोदरे ।
न ज्ञायते क्व मग्नेति तात जन्मनि जन्मनि ॥ ३२ ॥
चिन्ताचक्रे चिरं बद्धं कुक्रियाचारचञ्चुरम् ।
चेतो भ्रमति सामुद्रे गर्तावर्ते तृणं यथा ॥ ३३ ॥
उह्यमानमनन्तेषु चेतः कार्यमहोर्मिषु ।
क्षणमेति न विश्रान्तिं चिन्ताताण्डविताशयम् ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
हे प्रियवर, जनम-जनम में यह नहीं जाना जाता है कि परमपुरुषार्थ की साधनभूता
यह देहरूपी रत्नशलाका विनाशरूपी कीचड़ से पूर्ण सागर के पेट में किस जगह समा गई हे