Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 67, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 67, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
देहातीता महात्मानश्चिन्मात्रस्वात्मनि स्थिताः ।
दूराद्देहं समीक्षन्ते प्रेक्षको जनतामिव ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
स्थूल और सूक्ष्म दो देहों में होनेवाले अभिमान का परित्याग ही संसार के उच्छेद का उपाय है, इस
आशय से कहते हैं।
जैसे तटस्थ दर्शक पुरुष दूर से ही जनसमूह को देखता है, वैसे ही देहाभिमान से रहित, चिन्मात्र
स्वरूप अपनी आत्मा में निष्ठा रखनेवाले महात्मा लोग दूर से ही देह को देखते रहते हैं