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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 67, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 67, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

इदं भव्यमतेर्दुःखमनन्तमपि पेलवम् । कुखगस्याऽतरोऽम्भोधिः सर्पारेर्गोष्पदायते ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जैसे साधारण तुच्छ पक्षी के लिए दुस्तर सागर गरूड़जी के लिए गाय के खुरमात्र के समान है, वैसे ही पहले जिस दुःख का वर्णन किया जा चुका है, वह यद्यपि असीम है, तथापि भव्यमति (विवेकी) पुरुष के लिए वह अत्यन्त कोमल है यानी वह उसका उच्छेद अनायास कर सकता है