Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 67, Verse 7
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 67, verse 7 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 67 · श्लोक 7
संस्कृत श्लोक
केऽभवन्पयसां हंसाः पयसामुपलाश्च के ।
काः शिलाः किल दारूणां के भोगाः परमात्मनः ॥ ७ ॥
हिन्दी अर्थ
अहन्ता का त्याग होने पर किसी को भी कहीं पर भी ममता की प्राप्ति नहीं होती, इस अभिप्राय से
कहते हैं।
भला बतलाईये कि हंस जल के कौन और पाषाण जल के कौन होते हैं और शिलाएँ काष्ठों की कौन
होती हैं ? अर्थात् कोई नहीं होती, वैसे ही भोग परमात्मा के कौन होते हैं ? अर्थात् अचेतन और असंग
चित्त में कभी भी ममता नहीं हो सकती, यह भाव है