Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 68, Verse 40
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 68, verse 40 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 68 · श्लोक 40
संस्कृत श्लोक
मनःसङ्गैकरङ्गेण शून्ये व्योम्नि जगन्मयम् ।
यदिदं रचितं चित्रं तत्सत्यं न कदाचन ॥ ४० ॥
हिन्दी अर्थ
यद्यपि मन भले ही कुछ करे, तथापि यदि वह उसमें आसक्त नहीं है, तो वह अकर्ता के
सदृश ही है । आसक्ति वर्जित मन कर्मो के फलों का भोक्ता नहीं होता, यों तत्त्वज्ञ महानुभाव कहते
हैं