Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 69, Verse 12
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 69, verse 12 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 69 · श्लोक 12
संस्कृत श्लोक
निर्वाणमात्मनि गतः सततोदितात्मा जीवोऽरुचिर्व्यवहरन्नपि रामभद्र ।
नो सङ्गमेति गतसङ्गतया फलेन कर्मोद्भवेन सहतीव च देहभारम् ॥ १२ ॥
हिन्दी अर्थ
वृक्ष एक स्थान में चुपचाप खड़ा होकर अपने स्थावर शरीर से ठंड, वायु और धूप के क्लेशको जो
सहता (अनुभव करता) रहता है, वह भी आसक्ति के फल का ही विस्तार है