Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 69, Verse 8
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 69, verse 8 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 69 · श्लोक 8
संस्कृत श्लोक
केवलं चिति विश्रम्य किंचिच्चेत्यावलम्बिनि ।
सर्वत्र नीरसमिव तिष्ठत्वात्मरसं मनः ॥ ८ ॥
हिन्दी अर्थ
जो पुरुष, अत्यन्त कुशलतापूर्वक सम्पूर्ण कर्म और तज्जनित फल आदि केवल मन से ही, न
कि कर्म से, परित्याग करता है, वह असंसक्त कहलाता है साधारण लोगों को अच्छे अच्छे कर्मों में
प्रवृत्त कराने के लिए बाहर से तो वह कर्म आदि का अनुष्ठान करता रहता है, पर भीतर से उनमें
आसक्ति नहीं रखता । यह “न कर्मणा" इस वाक्य से बतलाया