Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 70, Verse 1
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 70, verse 1 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 1
संस्कृत श्लोक
श्रीवसिष्ठ उवाच ।
असंसङ्गसुखाभ्याससंस्थितैर्विततात्मभिः ।
व्यवहारिभिरप्यन्तर्वीतशोकभयैः स्थितम् ॥ १ ॥
हिन्दी अर्थ
श्रीवसिष्ठजी ने कहा : हे रामचन्द्रजी, विवेकी विद्वान् पुरुष भले ही सर्वदा तत् तत् समय के योग्य
समस्त व्यवहारो मे निरत रहे, भले ही तत्-तत् व्यवहार में उचित सभी प्रिय, पुत्र आदि के साथ रहे, भले
ही निषिद्ध लौकिक एवं शास्त्रीय समस्त कार्यो में व्यस्त रहे, तथापि उसे अपने मन को वैसा बनाना
चाहिए, जैसे मैं अभी आगे जाकर कहूँगा । अथवा एक काल, एक देश ओर एक सेवक आदि के सहभाव
से कतिपय कर्मो में तत्परता-संपादक परिच्छिन्न संसक्ति का परित्याग करने के लिए पहले सम्पूर्ण देश,
काल आदि समस्त उपकरण सामग्री से निखिल जगत् के व्यवहाररूप कर्मो मे स्वयं निरत हो कर भी पीछे
से अपने मन को वैसा बनाना चाहिए जैसे मैं आगे वर्णन करूँगा
सर्ग सन्दर्भ
अइसठ्वौँ सर्ग समाप्त उनहत्तरवाँ सर्ग सम्पूर्ण अर्थो में आसक्ति के त्याग से मन चिन्मात्रस्वरूप मेँ सुस्थिर तथा चिन्मात्रशेष जिस क्रम से हो जाता है, उस क्रम का कथन।