Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 70, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 70, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 70 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
नित्यमात्मदृशा लीनो ज्ञः स्वस्थश्चञ्चलोऽपि सन् ।
क्षुब्धो दृश्यत एवासौ प्रतिबिम्बार्कवन्मुधा ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
न भौंहों के बीच में, न नासिका के मध्य में, न मुख में, न दक्षिण नेत्र
की कनीनिका में, न अन्धकार में, न प्रकाश में और न इस हृदयरूपी आकाश मेँ मन को आसक्त करना
चाहिए