Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 15
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 71, verse 15 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 15
संस्कृत श्लोक
यथा समस्ताज्जलधौ जलादन्यन्न लभ्यते ।
तथैव जगतः स्फारादात्मनोऽन्यन्न लभ्यते ॥ १५ ॥
हिन्दी अर्थ
चित्त में चोट (पीड़ा) पहुँचानेवाली अहंकाररूपा ही शक्ति है, क्योकि वह इष्ट ओर
अनिष्ट के संयोग और वियोग से संताप देती है। परन्तु जब चित्त आत्मरूपता को प्राप्त हो गया, तब
वह चित्त में क्या और कैसे चोट पहुँचा सकती है ?