Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 18
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 71, verse 18 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 18
संस्कृत श्लोक
द्वित्वमभ्युपगम्यापि कथयामि तवारिहन् ।
देहादिभिः सद्भिरपि न संबन्धो विभोर्भवेत् ॥ १८ ॥
हिन्दी अर्थ
आश्रमोचित कर्मो का भी परित्याग कर देना चाहिए, ऐसा जो लोग मानते हैं, उसके प्रति कहते हैं ।
ज्ञानी पुरुष को कर्म का अनुष्ठान या परित्याग कुछ भी नहीं भाता, किन्तु जिन्होंने आत्मतत्व को
जान लिया है, ऐसे महात्मा जिस समय जो प्राप्त हो जाता हे, तदनुसार अनुवर्तन करते हुए अवस्थित
रहते हैं