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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 3

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 71, verse 3 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 3

संस्कृत श्लोक

सा हि विश्रान्तिपदवी दूरेभ्योऽपि दवीयसी । गम्या विदेहमुक्तानां खलेखेव नभस्वताम् ॥ ३ ॥

हिन्दी अर्थ

जिस तत्त्ववित्‌ के अनुग्रह से दूसरे भी जब क्षोमरूपी मलिनता से निर्मुक्त हो जाते हैं, तब उस तत्त्ववित्‌ की क्षोभशून्यता में तो कहना ही क्या ? इस आशय से कहते है । जिस महात्मा का अन्तःकरण इन्द्रियों की आसक्तियों से वर्जित, केवल चैतन्य मात्र का अवलम्बन करनेवाला तथा समस्त चिन्ता ज्वरं से निर्मुक्त है, उस महात्मा से सम्पूर्ण जन, निर्मली से जल की भाँति, प्रसन्न (विशुद्ध) हो जाते हैं