Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 4
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 71, verse 4 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 4
संस्कृत श्लोक
सुषुप्तावस्थया कंचित्कालं भुक्त्वा जगत्स्थितिम् ।
तुर्यतामेति तदनु परमानन्दघूर्णितः ॥ ४ ॥
हिन्दी अर्थ
सदा सर्वदा आत्मदृष्टि में निमग्न रहनेवाला तत्त्ववित् बाहर से चंचल
होते हुए भी अपने स्वरूप से तनिक भी टस से मस नहीं होता, अतएव साधारण जनों द्वारा यह जो क्षुब्ध-
सादेखा जाता हे, वह जलगत सूर्य प्रतिबिम्ब की क्षुब्धता के दशर्न के समान मिथ्या ही है