Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 71, Verse 5
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 71, verse 5 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 71 · श्लोक 5
संस्कृत श्लोक
तुर्यातीतदशां तज्ज्ञा यथा यान्त्यात्मकोविदाः ।
तथाधिगच्छ निर्द्वन्द्वं पदं रघुकुलोद्वह ॥ ५ ॥
हिन्दी अर्थ
स्वस्वरूप
मेँ निरन्तर रमण करनेवाले तथा परम मोक्षरूपी उदय को प्राप्त हुए तत्त्ववित् महात्मा साधारण लोगों को
ऊपर ऊपर से मोर के पंख की नाई चपल मालूम पडते हैं, परन्तु भीतर से मेरु पर्वत की नाई अटल हैं