Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 30
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verse 30 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 30
संस्कृत श्लोक
यदृश्यं तदसत्सद्वा दृष्टिमेकामुपाश्रितम् ।
अन्यत्त्वलेपकं तस्माद्धर्षशोकदृशौ कुतः ॥ ३० ॥
हिन्दी अर्थ
यदि शंका हो कि देह, दुःख आदि का अनुभव प्रत्यक्ष आदि प्रमाणो से होता है ओर आत्मा का भी
अनुभव श्रुति ओर तदनुकूल युक्तियों से होता है, इसलिए जब दोनों अनुभव प्रमाण-जनित होने के
कारण समान ही हैं, तब ऐसा कौन विशेष है कि जिसके आधार पर आप यह कहते हैं : आत्मद्ष्टि
अवलम्बन कर देहादि दुष्ट का परित्याग कर देना चाहिए, तो इस शंका पर कहते हैं।
श्रीरामजी, पर्वत और तिनके में तथा रेशम और पत्थर में जो विशेष कहा जाता है, वही विशेष
परमात्मा और शरीर की समानता के प्रति कहा जा सकता है। भाव यह है जैसे पर्वत और तिनका इन दो
के मध्य में दूर से चक्षु के द्वारा पर्वत पर ही दृष्टि पड़ती है, क्योंकि पर्वत बड़ा और स्थिर है, इसलिए
उसमें अनायास दृष्टि सरल हो जाती है । तिनका अतिचंचल और तुच्छ है, अतः दूर से चक्षुके द्वारा
तृण-दृष्टि दुष्कर हो जाती है । इसी प्रकार रेशम और पत्थर के बीच में भी मृदु ओर सुख स्पर्श होने के
कारण त्वचाइन्द्रिय से रेशम का स्पर्श ही उपादेय होता है, कठोर और दुःखद होने के कारण पाषाण का
स्पर्श उपादेय नहीं होता, प्रत्युत हेय ही होता है, बस इसी प्रकार परमात्मा और देहादि अनात्मा के बीच
मेँ भी अपरिच्छिन्न, सदा-सर्वदा स्वप्रकाश और आनन्दरूप होने के कारण परमात्मदृष्टि उपादेय एवं
सुकर है और तुच्छ, अस्थिर और मन आदि से सापेक्ष होने के कारण देहादि अनात्मदृष्टि हेय और
दुष्कर है, यों आत्मा और अनात्मा की दृष्टि में महान् वैषम्य होने से साम्य नहीं हो सकता