Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verses 31–32
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verses 31–32 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 31
संस्कृत श्लोक
असत्यमेवासत्यं हि सत्यं सत्यं सदेव हि ।
सत्यासत्यमसद्विद्धि तदर्थं किं नु मुह्यसि ॥ ३१ ॥
असम्यग्दर्शनं त्यक्त्वा सम्यक्पश्य सुलोचन ।
न क्वचिन्मुह्यति प्रौढः सम्यग्दर्शनवानिह ॥ ३२ ॥
हिन्दी अर्थ
विरोध होने से भी शरीर और आत्मा के संबन्ध की नाई सादृश्य भी निरस्त किया जा सकता है,
ऐसा कहते हैं।
हे श्रीरामजी, जैसे परस्पर अत्यन्त विरुद्ध तेज और तिमिर का एक दूसरे से सम्बन्ध और सादृश्य
नहीं हो सकता, वैसे ही परस्पर अत्यन्त विरुद्ध आत्मा और शरीर का भी एक दूसरे से सम्बन्ध और
सादृश्य नहीं हो सकता