Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 35
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verse 35 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 35
संस्कृत श्लोक
ददात्यज्ञाय संसारं ज्ञाय मोक्षं सदोदयम् ।
दृश्यदर्शनसंबन्धसुखमात्मवपुर्विदुः ॥ ३५ ॥
हिन्दी अर्थ
इसी युक्ति से चक्षु आदि सम्पूर्ण इन्द्रियों का स्पन्द भी वायु से ही होता है आत्मा का तो कार्य केवल
संवित् ही है, दूसरा नहीं, यह कहते हैं।
विषय-प्रदेश में होनेवाले चक्षुःस्पन्द में हेतुभूत कनीनिका का परिस्पन्द भी केवल प्राण-वायु से
ही होता है, यों समस्त इन्द्रियों के स्फुरण से उत्पद्यमान उक्त स्फूर्तिरूपा संवित् ही केवल आत्मा से
होती है, दूसरा कुछ भी नहीं होता