Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 44
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verse 44 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 44
संस्कृत श्लोक
तदतीतं पदं यत्स्यात्तन्न किंचिदिवेह तत् ।
यथाभूतमिदं सम्यग्ज्ञस्य संपश्यतो जगत् ॥ ४४ ॥
हिन्दी अर्थ
अन्यथाग्रहण के संस्कारों की सामर्थ्यरूप मोह से
विभ्रमो की बीज घनीभूत सत्ता का (चित्तपरिणाम का) अन्तःकरण ने ग्रहण किया है, जैसे मोह से
असम्भावित अन्धकार सूर्य से दिखाई देता है, वैसे ही सम्मोह से ही असंभावित जन्मादि परम्परा
आत्मा में दिखाई देती हे । अथवा जैसे सूर्य से ही उसको ग्रसनेवाला राहुरूप तम दिखाई देता है, वैसे ही
तथोक्त कारण से चित्त परिणाम को ग्रहण करनेवाला अज्ञान “मेँ अज्ञ हूँ यों प्रत्यक्षरूप से आत्मा में
सभी पुरुषों को दिखाई पड़ता हे