Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 72, Verse 45
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 72, verse 45 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 72 · श्लोक 45
संस्कृत श्लोक
सर्वमात्ममयं विश्वं नास्त्यनात्ममयं क्वचित् ।
काठिन्यद्रवणस्पन्दखावकाशावलोकनैः ॥ ४५ ॥
हिन्दी अर्थ
तब चित्त विनाश किस कारण से होता है ? इस प्रश्न पर चित्त विनाश में कारण कहते हैं।
हे रामजी, जैसे दीप से अन्धकार तत्क्षण ही असत्ता को प्राप्त हो जाता है, वैसे ही अबाधित आत्मा
के केवल स्वरूप-ज्ञान से ही चित्त तत्क्षण असत्ता को पूर्णरूप से प्राप्त यानी नष्ट हो जाता हे