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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 17

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verse 17 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 17

संस्कृत श्लोक

तत्रायमहमागन्ता भोक्ता कर्तेति जायते । मुधैवाज्ञाततापोत्था मृगतृष्णेव वासना ॥ १७ ॥

हिन्दी अर्थ

आत्मा प्रत्यक्ष ओर परोक्ष वेद्य, व्यक्त एवं अव्यक्त दोनों से विलक्षण है, इस कथन से दृश्य और दर्शन दोनों से भी वह निर्मुक्त है, इसका उपपादन करते है । यह प्रकाशात्मक आत्मदेव न तो सत्‌ है ओर न असत्‌ है, न अणु है और न महान्‌ है, न सत्‌ और असत्‌ की दृष्टि के मध्य में यानि सत्यासत्य है, किन्तु वही द्योतनात्मक देव इस दृश्यमान समस्त जगत्‌ का स्वरूपभूत है