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Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verses 20–21

यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verses 20–21 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।

उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 20

संस्कृत श्लोक

अविद्या संपरिज्ञाता न चैनं परिकर्षति । मृगतृष्णा परिज्ञाता तर्षुले नावकर्षति ॥ २० ॥ परमार्थावबोधेन समूलं राम वासना । दीपेनेवान्धकारश्रीर्गलत्यालोक एति च ॥ २१ ॥

हिन्दी अर्थ

हे श्रीरामजी, वह प्रकाशमान परमात्मा तीनों कालों में सब जगह अवस्थित हे, वह यद्यपि सदा नित्य स्वप्रकाश, पूर्ण एवं अपरोक्ष स्वभाव है, तथापि सूक्ष्म और व्यापक होने के कारण स्थूल-विषयों में आसक्त बुद्धिवाले पुरुष उसका परिज्ञान नहीं कर सकते है