Yoga Vasistha — Upashama Prakarana (Dissolution), Sarga 74, Verse 34
यह पृष्ठ योगवासिष्ठ के उपशम प्रकरण, सर्ग 74, verse 34 का मूल संस्कृत श्लोक और उसका हिंदी अर्थ प्रस्तुत करता है।
उपशम प्रकरण · सर्ग 74 · श्लोक 34
संस्कृत श्लोक
निर्मृष्टकामपङ्काङ्कश्छिन्नबन्धनिजभ्रमः ।
द्वन्द्वदोषभयोन्मुक्तस्तीर्णसंसारसागरः ॥ ३४ ॥
हिन्दी अर्थ
जैसे गेहूँ आदि
को पीसने के लिए विनिर्मित जल-चक्की आदि यन्त्र के द्वारा गेहूँ आदि का पीसना प्रवृत्त होने पर पुरुष
केवल संनिधिमात्र से उक्त कार्य को करता हुआ-सा पर स्वतः तो काम आदि व्यापारो से शून्य होकर
स्थित रहता हे, वैसे ही विद्वान् को मोक्ष ओर बन्धरूषी दोनों ही कल्पनाओं का परित्याग कर तथा
स्वतः समस्त व्यापारो से शून्य होकर देह आदि से व्यवहार करना चाहिए